SaatRang : अभ्यर्थी और नवनियुक्त शिक्षकों से चंद सवाल

सड़क से सोशल मीडिया तक शिक्षक अभ्यर्थी नौकरी के लिए आवाज उठाते दिखते हैं। यह अच्छा है, लेकिन वे ‘राष्ट्र निर्माता’ कहलाते हैं, इसलिए कुछ सवाल जरूरी हैं।

रोटी कमाने के विविध तरीके हैं, लेकिन कुछ पेशे ऐसे हैं, जिनका चुनाव सिर्फ रोटी कमाने के लिए नहीं किया जाता। इनमें शिक्षक भी हैं। इन पर बड़ी जिम्मेदारी होती है। शिक्षक अपने क्लास में बच्चों से जो बोलते हैं, उसका असर उनके दिमाग पर वर्षों तक, कभी-कभी जिंदगी भर रहता है। शिक्षकों पर यह बड़ी जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को अच्छा नागरिक बनाएं।

अच्छा नागरिक किसे कहेंगे? दो दिन पहले सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि लोकतंत्र और सत्य साथ-साथ चलते हैं। कोई भी निरंकुश सरकार झूठ पर ही टिकी होती है, वह लगातार झूठ गढ़ती है, जिससे उसका प्रभुत्व बना रहे। बुद्धिजीवियों का कर्तव्य है कि वे सत्ता को सच का आईना दिखाएं।

हमने ट्विटर पर सत्ता के झूठ को बेनकाब करते किसी शिक्षक अभ्यर्थी को नहीं देखा। एक आईएएस अधिकारी ने हरियाणा में कहा कि कोई किसान आए, तो उसका सिर फोड़ दो। मध्य प्रदेश से लेकर उत्तर प्रदेश तक ऐसी कई घटनाएं हो रही हैं, जिनमें किसी मुस्लिम फेरीवाले, फुटपाथ पर रोजी कमानेवाले दुकानदार के साथ मारपीट की जा रही है। कहीं, उन्हें जयश्रीराम कहने के लिए मजबूर किया जा रहा है, कहीं दुकान के नाम पर आपत्ति जताते हुए अपमानित किया जा रहा है। हरियाणा में पुलिस लाठीचार्ज के बाद एक किसान की मौत हो गई। किसान नेता राकेश टिकैत ने सरकार को तालिबानी सरकार कहा।

इन मामलों पर हमने किसी शिक्षक अभ्यर्थी को आवाज उठाते नहीं देखा। संभव है किसी-किसी ने आवाज उठाई हो, पर यह शिक्षक अभ्यर्थियों का ट्रेंड तो बिल्कुल ही नहीं है, जिसमें वे राष्ट्रीय सवालों पर अपनी एकजुटता दिखाते दिखते हों।

आपको याद होगा पांच दिन पहले चीफ जस्टिस एमवी रमन्ना ने कहा था कि देश की पुलिस सत्ताधारी दल के साथ सांठगांठ करके जनता पर दमन करती है। कितने शिक्षक अभ्यर्थी चीफ जस्टिस के साथ खड़े हैं, यह नहीं दिखा।

दो दिन पहले भारत की शोध संस्था-भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद ने आजादी के अमृत महोत्सव के लिए जारी पोस्टर से नेहरू का फोटो गायब कर दिया और अंग्रेजों से पेंशन पानेवाले सावरकर का फोटो लगा दिया। क्या आपने कोई आवाज उठाई?

महंगाई, बेरोजगारी के अलावा अभी भारत सरकार ने देश की संपदा को बेचने का अभियान शुरू किया है। इसे सुंदर नाम दिया है-संपत्ति मौद्रीकरण योजना। कितने शिक्षक अभ्यर्थियों ने इसका विरोध किया?

अगर हम देश की लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष परंपराओं की रक्षा के लिए खड़े नहीं होते हैं, तो कोई ‘आयुष’ बन जाने की आशंका ज्यादा है, जो अपने ही देश के नागरिकों से घृणा करेगा और कहेगा कि देश में लोकतंत्र की जरूरत नहीं है। सावरकर पर चुप रहेंगे, तो कल गांधी के हत्यारे गोडसे को महिमामंडित करने पर भी चुप ही रहने की संभावना रहेगी।

जो सिर्फ रोटी के लिए मजदूरी करते हैं, उन्हें भी बोलना चाहिए, पर एक मिनट के लिए उनकी चुप्पी क्षम्य है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ने भी सत्ता के सामने सत्य बोलने के बारे में कहा कि यह बुद्धिजीवियों की ड्यूटी है। आप तो बुद्धिजीवी हैं, आपसे अपेक्षा जरूर है कि आप बोलें।

कोई कह सकता है कि शिक्षक होने पर सरकार के खिलाफ कैसे बोलें? तो याद रखिए कथा सम्राट प्रमचंद भी शिक्षक थे। पूर्वी यूरोप के कई देशों में पिछली सदी में निरंकुश सत्ता थी। वहीं भी लेखकों-कवियों ने प्रतिरोध किया। कहने के नायाब तरीके इजाद किए। कई को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। ठीक है, आप सीएम-पीएम का नाम लेकर नहीं बोल सकते, पर भाईचारा सम्मेलन करने से कौन रोकता है? बहुत तरीके हैं, समझ और इच्छाशक्ति चाहिए।

पहले बुद्धिजीवी देश को अपने आंदोलनों से राह दिखाते रहे हैं। अब देश का किसान राह दिखा रहा है। उन्होंने समझ लिया है कि तीन कृषि कानूनों को रद्द करने का आंदोलन देश की जनता के आंदोलन और देश में लोकतंत्र बचाने के आंदोलन का हिस्सा है। वे समझ चुके हैं कि किसानों का खेत तभी बचेगा, जब देश में लोकतंत्र बचेगा। वे प. यूपी में हिंदू-मुस्लिम भाईचारा सम्मेलन में शामिल हो रहे हैं। क्या शिक्षक आंदोलनकारियों ने कोई ऐसा उदाहरण पेश किया है? आप देश की चिंता के साथ खड़े न हों, फिर भी हो सकता है आप शिक्षक बन जाएं, पर क्या आप राष्ट्र निर्माता बन पाएंगे? …सोचिएगा।

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By Editor


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