एडिटोरियल कमेंट:बताइए नित्यानंद साबह क्या जनता ने अररिया को ISI का गढ़ बनाने के लिए वोट किया?

लोकतंत्र में कोई चुनावी हार- जीत अंतिम नहीं होती. हर जीत के बाद उम्मीदों की एक नयी इमारत खड़ी होती है. यह इमारत विकास की, अमन की और भाईचारे की कामना की होती है.पर बिहार इकाई के अध्यक्ष नित्यानंद राय यह समझ नहीं सके. उनकी नफरत हार गयी और राजद के सरफराज जीत गये

नित्यानंद के विभाजनकारी बयान के बावजूद राजद के सरफराज ने जीत दर्ज की

 

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इर्शादुल हक, एडिटर नौकरशाही डॉट कॉम

जनता शांति और इंसाफ के साथ विकास चाहती है. अररिया समेत अन्य राज्यों में हुए उपचुनावों में जनता ने अपना फैसला सुना दिया है. अब जनप्रतिनिधियों की बारी है कि वे  जनता की उम्मीदों की इमारत बनायें, सजायें सवारें

 

लेकिन अगर हमारे नेता ही जनता की उम्मीदों में चुनाव से पहले आग लगाने की कोशिश करें. नफरत की बुनियाद पर अपने जीत का महल खड़ा करना चाहें तो निश्चित रूप से खतरे की घंटी बजती हुई महसूस होती है. अररिया लोकसभा उपचुनाव में भाजपा की बिहार प्रदेश इकाई के अध्यक्ष  नित्यानंद राय ने नफरत और द्वेष के बूते जीत की इमारत खड़ी करना चाही. वे नाकाम रहे. अररिया के लाखों वोटरों ने नफरत के महल को बनने से पहले धरासाई कर दिया. याद करने की बात है कि नित्यानंद राय ने एक चुनावी रैली में कहा था कि अगर अररिया (लोकसभा उपचुनाव) में राजद के सरफराज आलम जीतते हैं तो यह क्षेत्र आईएसआई का गढ़ बन जायेगा. और अगर  भाजपा के प्रदीप सिंह जीतते हैं तो अररिया नेशनलिस्टों का गढ़ बन जायेगा.

 

नित्यानंद राय के इस विवादित बयान पर यूं तो चुनाव आयोग ने उनके खिलाफ केस कर दिया. लेकिन उनके इस बयान से उनकी रानीतिक मंशा उजागर हो गयी. नित्यानंद जी को शायद ऐसा विवादित बयान देने की प्रेरणा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से मिली होगी. अमित शाह ने  2015 विधानसभा चुनाव के दौरान कहा था कि अगर भाजपा हारेगी तो पाकिस्तान में पटाखे फोड़े जायेंगे. लेकिन शाह के इस बयान को भले ही नित्यानंद राय ने प्रेररक वाक्य मान लिया पर उन्होंने यह याद नहीं रखा कि बिहार के अवाम नफरत की सियासत को 2015 में भी गिराया था. उसी अवाम ने अररिया में भी अपने वोटों से वही प्रतिक्रिया दोहराई है.

 

अररिया लोकसभा उपचुनाव के परिणाम हमारे सामने हैं. वहां पर राष्ट्रीय जनता दल के उम्मीदवार सरफराज आलम ने भाजपा के अपने करीबी कंटेस्टेंट प्रदीप सिंह को हरा दिया. सरफराज की जीत के आंकड़ों को गौर से देखें तो पता चलता है कि इसमें हर जाति, हर धर्म और हर तबके के वोटर की हिस्सेदारी है. लोकंतंत्र की ताकत इसे ही कहते हैं. जनता ने अपनी ताकत और अपना फैसला सुना दिया है. जिसका पैगाम यह है कि उन्हें नफरत नहीं चाहिए, उन्हें समाज को तोड़ने वाले बयान पसंद नहीं, उन्हें अमन चाहिए. भाईचारा चाहिए. न्याय चाहिए और न्याय के साथ विकास चाहिए.

अररिया का चुनाव परिणाम न सिर्फ  नित्यानंद राय जी को, बल्कि हर उस नेता के लिए एक पैगाम है जो विभाजनकारी राजनीति के सहारे चुनावी जीत हासिल करना चाहते हैं. चाहे यह विभाजनकारी राजनीति जाति के आधार पर हो, धर्म के आधार पर हो या ऊंच-नीच के आधार पर हो.

 

 

 

 

 

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