चीन का पीछे हटना कारगिल फतह से कम नहीं

नवीन निगम का मानना है कि लदाख से चीनी फौज का पीछे हटना भारत के लिए कारगिल फतह जैसी जीत है.

भारत में लोग आश्चर्यचकित है कि चीन पीछे कैसे लौटा, इसे देश का दुर्भाग्य ही कहेगे कि हमारी जनता को अपनी सेना की क्षमता चीन की सेना से कम लगती है।

मैं यह बात इसलिए कह रहा हूं कि इसी तरह की लम्बी घुसपैठ 1986 में अरुणाचल में भी हुई थी। 1986 में अरुणाचल प्रदेश के समदुरोंग छू घाटी में चीनी सैनिकों ने अपनी चौकी स्थापित कर ली थी जो भारतीय सेना की ओर से जवाबी चुनौती दिए जाने के बाद हटा ली गई थी। यानी चीन को पता था कि बहुत दिन तक नहीं हटे तो भारतीय सेना कौन सा कदम उठा सकती है.

प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध इसलिए हुए क्योंकि जर्मनी, जापान और इटली को फ्रांस और ब्रिटेन की तरह उपनिवेश चाहिए थे जहां वह अपने देश में बने माल को खपा सके। आर्थिक रूप से देखा जाए तो आज भारत, चीन के लिए एक ऐसा बाजार है जहां उसका अरबों डॉलर का मॉल बिकता है.

इसका मतलब यह हुआ कि यदि भारत में बहिष्कार हुआ तो चीनी मॉल कहा खपेगा.

याद रखिए महात्मा गांधी को भी ब्रिटेन ने तब महत्व देना शुरू किया जब विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई और मनचेस्टर की कपड़ा मिले बंद होने लगी। चीन ने जब देखा कि भारत सैनिक कार्रवाई की धमकी भी दे सकता है (जैसी धमकी उसने 1986 में दी थी) और व्यापार भी चौपट हो सकता है तो वह पीछे हटने को मजबूर हो गया.

वन इंडिया में व्यक्त विचार

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