झारखंड में कमजोर हुआ बाबू कल्चर, गांवों में दरी पर बैठ रहे IAS

झारखंड में कमजोर हुआ बाबू कल्चर, गांवों में दरी पर बैठ रहे IAS

पीएम मोदी ने संसद में IAS की कार्यशैली की खुलकर आलोचना की थी। उन्हें बाबू कहा था। वहीं, झारखंड की ब्यूरोक्रेसी दरी पर बैठकर लोगों से सीधे बात कर रही।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में जब आईएएस अधिकारियों की आलोचना करते हुए कहा था कि बाबू कल्चर नहीं चलेगा, तब अनेक लोगों को यह अच्छा लगा था। यह आम धारणा है कि यूपीएससी से आनेवाले ये बड़े अधिकारी कमरों में बैठकर ही सारा निर्णय लेते हैं, कभी जमीन पर नहीं जाते।

इसके बाद लैटरल इंट्री की शुरुआत हुई। अब बिना यूपीएससी परीक्षा पास किए भी किसी को सेक्रेटरी या डायरेक्टर जैसा बड़ा अधिकारी बनाया जा सकता है। सुधार जरूर होना चाहिए, पर खारिज कर देना, बाबू कहकर मजाक उड़ाना कहां तक सही है?

इधर झारखंड में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पहल से नया नजारा दिख रहा है। आज उन्होंने एक तस्वीर रिट्वीट की, जिसमें सिमडेगा के डीसी दूर-दराज के एक गांव में पेड़ के नीचे दरी पर बैठे हैं और सामने ग्रामीण हैं। डीसी सिमडेगा ने ट्वीट किया- शत प्रतिशत योग्य व्यक्तियों को टीकाकरण कराने में सफल सदर प्रखण्ड के कुल्लूकेरा पंचायत के वनमारा गांव का भ्रमण कर एवं ग्रामीणों से चर्चा करते हुए बेहतर कार्य करने वालों को सम्मानित किया एवं गांव को पुरस्कृत करने हेतु टोलाओं का दौरा कर विकाश की संभावनाओं को तलाशा।

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ऐसी तस्वीर की कल्पना इससे पहले नहीं की जा सकती थी। एक आईएएस अधिकारी तक बड़े लोगों की ही पहुंच होती है, पर अब गांव के साधारण स्त्री-पुरुष अपनी परेशानी रख रहे हैं। इससे दो स्तरों पर बदलाव आएगा। पहला, डीसी जब सीधे ग्रामीणों से मिल रहे हैं, तो उन्हें यह भी पता चलेगा कि सरकार की योजनाओं को आम जन तक पहुंचाने में कहां-कहां छेद है। वे उन छिद्रों को बंद कर सकते हैं। योजनाओं का क्रियान्वयन बेहतर होगा।

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उधर, ग्रामीणों का सशक्तीकरण होगा। जरूर इसे एक सिस्टम का स्वरूप दिया जाना चाहिए, ताकि कल जब डीसी शहर चले जाएं, तब भी ग्रामीण अपनी बात उनतक पहुंचा सकें।   

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