कहानी आनंद मोहन की: तेजस्वी की पनाह में लालू का विरोधी

कहानी आनंद मोहन की: तेजस्वी की पनाह में लालू का विरोधी

90 के दशक में बिहार की राजनीति में एक धूरी रहे आनंद मोहन गोपालगज डीएम की हत्या में सजा काट जेल से बाहर आ रहे हैं. पढ़िये इर्शादुल हक का कॉल्म हक की बात

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Irshadul Haque, Editor naukarshahi.com

आनंद मोहन 1990 में जनता दल से विधायक चुने गये थे. वह 1996 और 1998 में सांसद रहे. अपनी राजनीतिक रसूख के कारण पत्नी ( Lovely Anand) लवली आनंद मोहन को शिवहर की सासंद के रूप में जीत दिलवाई.

1993 में उन्होंने बिहार पीपुल्स पार्टी का गठन किया. सवर्ण समाज से राजपूत होने के कारण बिहार के मीडिया की राजपूतों की मजबूत लॉबी के चहेते रहे आनंद मोहन को अखबारों में हीरोइक इमेज मिलता रहा. दूसरी तरफ बाहुबली की पहचान रखने के कारण अक्सर वह चर्चा में रहे.

1995 के बिहार विधान सभा चुनाव के दौरान मीडिया ने उन्हें लालू प्रसाद से भी ज्यादा बड़ा स्पेस दे कर मीडिया का दुलरुआ बना डाला था. उस दौरान की रिपोर्टिंग पर गौर करें तो लगता था कि बस चुनाव नतीजों की घोषणा होनी बाकी है और आनंद मोहन बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने वाले हैं.

आनंद मोहन जेल में यूं कर रहे हैं नेतागिरी

लेकिन जब परिणाम आया तो बिहार पीपुल्स पार्टी नाम की आनंद मोहन सिंह की नये नवेली पार्टी औंधे मुंह गिरी. यहां तक की खुद आनंद मोहन जो संभवत: दो या तीन जगह से चुनाव चुनाव लड़ रहे थे, बुरी तरह हार गये.

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अखबारों के सवर्ण लॉबी ने आनंद मोहन को लालू के समतुल्य खड़ा करने की मंशा धारासाई तो हुई ही साथ ही उसी समय मीडिया का सवर्णवादी रवैया बेनकाब हो गया.

दूसरी तरफ लालू प्रसाद यादव की पार्टी, जिन्हें मीडिया हर हाल में हारता हुआ देखना चाहता था, पहले से और मजबूत जनादेश के साथ दोबारा मुख्यमंत्री बन गये.

आनंद दम्पत्ति की खूबसूरत जोड़ी की तब खूब होती थी चर्चा

सहरसा से एक दबंग व बाहुबली की छवि लिये राजनीति में सक्रिय हुए आनंद मोहन ने 1993 में बिहार पीपुल्स पार्टी का गठन किया था. 1995 में पहली और शायद अंतिम बार यह पार्टी चुनाव लड़ी और कुछ ही सालों में इसका वजूद मिट गया.

तब तक राजनीति और पत्रकारिता में दिलचस्पी रखने वाले की हैसियत से मैं भी दंग था. मेरी कच्ची उम्र को आनंद मोहन की चमचमाती छवि और धूल उड़ाती उनकी गाडियों का काफिला दीगर युवाओं की तरह आकर्षित करता था. लेकिन पत्रकारीय जीवन के के शुरुआती दिनों में ही मीडिया के बायस्ड रवैये को जानने का मौका तभी मिला.

मुझे यह भी याद है कि तब अखबारों के युवा साथी आनंद मोहन की चर्चा बड़े गौरवपूर्ण लहजे में सुनाते थे. कुछ पत्रकार यह सुना कर और भी गर्वान्वित हुआ करते थे कि विधान सभा के अंदर आनंद मोहन ने लालू यादव पर कुर्सी या कुछ और उठा कर पर फेका था. यह बात कितनी सच थी, मुझे नहीं मालूम पर एक यादव मुख्यमंत्री जो तब तक जन नेता बन चुका था, पर कुर्सी फेकने का (कथित) साहसिक काम करके आनंद मोहन उनकी नजरों में नायक बने थे.

लकेिन 1995 के विधान सभा चुनाव ने आनंदि मोहन को, उनकी वास्तविक हैसियत दिखा दी थी. इस हार ने दो चीजें स्पष्ट कर दी थीं. एक- पिछड़ी जातियों में राजनीतिक चेतना को मजबूत हो चुका होना और दूसरा- मीडिया का बेशर्मी से सवर्णवादी विचारों का समर्थक होना.

गोपालगंज के डीएम का हत्यारा

आनंद मोहन के राजनीतिक करियर को उनकी दबंग छवि ने आगे बढ़ाया और बिहार में चर्चित नेता के रूप में उभारा तो दूसरी तरफ आनंद मोहन के राजनीतिक जीवन के पहले अध्याय का अंत भी उनकी दबंग छवि के कारण हो गया. गोपाल गंज के डीेएम जी कृष्णैया ( Gopalganj DM G Krishnaiyyah) को सरे राह आनंद मोहन के नेतृत्व वाली भीड़ ने हत्या कर दी. इस खबर से पूरे देश में तूफान खड़ा हो गया. इसके बाद 2007 में आनंद मोहन को अदालत ने उम्र कैद की सजा सुनाई. वह सहरसा की जेल में बंद हैं. उनकी सजा पूरी हो चुकी है. अब वह कुछ ही दिनों में जेल से बाहर आ जायेंगे.

इस बीच 2020 में आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद और बेटे चेतन आनंद ने राजद में पनाह ली. 2020 के चुनाव में चेतन आनंद ने शिवहर विधान सभा से चुनाव लड़ा और पहली ही बार में जीत गये.

यह समय का फेर है कि जिन लालू प्रसाद के खिलाफ आनंद मोहन ने अपना राजनीतिक जीवन खपाया उन्ही आनंद मोहन के बेटे और पत्नी को लालू की पार्टी ने पनाह दी.

अगे क्या होगा

अब सवाल यह है कि आनंद मोहन जेल से बाहर होने के बाद क्या करेंगे. क्या वह अपनी पत्नी व बेटे के साथ स्वतंत्र अस्तित्व के साथ नयी राजनीति की शुरुआत करेंगे? क्या वह बेटे और पत्नी के साथ राजद में शामिल होंगे? या फिर आनंद मोहन कोई और योजना बना रहे हैं? ये तमाम गुत्थियिां आने वाले दिनों में खुलेंगी.

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