पाकिस्तान स्थित श्रीकरतारपुर साहिब से लौटकर लिखी किताब

पाकिस्तान स्थित श्रीकरतारपुर साहिब से लौटकर लिखी किताब

पटना के गुरुदयाल सिंह हाल में पाक स्थित श्रीकरतारपुर साहिब से लौटे हैं। यात्रा वृतांत को पुस्तक रूप में प्रकाशित किया है, जिसमें श्रद्धा व प्यार दोनों है।

पटना पंजाबी बिरादरी के पूर्व अध्यक्ष और समाजसेवी सरदार गुरुदयाल सिंह पाकिस्तान स्थित श्री करतारपुर साहिब से हाल ही लौटे हैं। उन्होंने अपने यात्रा वृतांत को ‘श्री करतारपुर साहिब की सुखद यात्रा’ नाम से पुस्तक का रूप देकर प्रकाशित किया है। कथा शैली में लिखे इस यात्रा वृतांत में श्रद्धा और प्यार दोनों है। श्रीकरतारपुर साहिब सिखों के सर्वाधिक पवित्र स्थलों में एक है। गुरु नानक जी ने अपनी चारों उदासियों (धार्मिक यात्रा) के बाद अंतिम 18 वर्ष यहीं गुजारे। यत्रा वृतांत में अनेक सिख गुरुओं तथा गुरुद्वारों की चर्चा है साथ ही श्रीकरतारपुर साहिब में मुस्लिम भाइयों ने जिस प्रकार आत्मीयता से सभी का स्वागत किया, उसका भी उल्लेख है।

सरदार गुरुदयाल सिंह ने यात्रा की योजना बनाने, यात्रा के लिए आवेदन के साथ ही जालंधर और अमृतसर के बीच के प्रमुख गुरुद्वारों और गुरुओं की स्मृति को भी पुस्तक में संजोया है। यात्रा में उनके साथ बेटा मनप्रीत सिंह, पुत्रवधू परमजीत, पोते नवकीरत तथा सरताज थे। गुरुदयाल सिंह ने पुस्तक में गुरुद्वारा श्री हट साहिब, गुरुदावारा श्री बेर साहिब, गुरुद्वारा श्री गोविंदबाल साहिब, बाउली साहिब, गुरुद्वारा श्री अमृतसर हरिमंदिर साहिब, गुरुद्वारा श्री डेरा बाबा नानक, बाबा बकाला, श्री बाबा दीप सिंह गुरुद्वारा और श्रीकरतारपुर साहिब की चर्चा बड़े ही श्रद्धा और प्रेम से की है। पुस्तक में जिन गुरुद्वारों की चर्चा की गई है, उनका महत्व भी बताया गया है।

पुस्तक में श्रीकरतारपुर साहिब पहुंचने के बाद का उल्लेख करते हुए गुरुदयाल सिंह ने पुस्तक में लिखा है- श्री करतारपुर साहिब कॉरिडोर की इंट्री फीस 20 डॉलर (1660 रुपए) है। भारतीय सीमा से लगभग चार किमी पर स्थित श्रीकरतारपुर साहिब गुरुद्वारे के कई एकड़ में खाली भूमि है, जहां गुरुजी ने स्वयं 18 साल खेती की। दर्शन ड्योढ़ी के अंदर प्रवेश करने पर मुसलमान भाइयों ने हमारा हार्दिक सवागत किया। किसी भी सेवा के लिए अपनी पेशकश की। उनकी बोली हमारे पंजाब की तरह थी। हमें ऐसा लगा कि हम पंजाब के गुरुद्वारे के दर्शन कर रहे हैं, पाकिस्तान के नहीं।

पुस्तक में गुरुदयाल सिंह लिखते हैं कि गुरुजी को हिंदू-मुस्लिम दोनों के हरमन प्यारे थे। उनकी मृत्यु के बाद अपने-अपने रिवाज से अंतिम संस्कार करने के लिए हिंदू-मुस्लिम झगड़ने लगे थे। हिंदू उन्हें अपना गुरु तो मुस्लिम उन्हें अपना पीर मानते थे। जब शव से कपड़ा हटाया गया, तो वहां सिर्फ फूल पड़े थे। दोनों समुदायों ने फूल बांट लिये और बड़े ही प्रेम-सद्भाव के साथ गुरुजी का अंतिम संस्कार किया। इसीलिए यहां दो समाधियां बनी हुई हैं। सभी दोनों पर नतमस्तक होते हैं।

पुस्तक में कई तस्वीरें भी हैं, जो यात्रा वृतांत को सजीव बनाती हैं। पुस्तक अनेक लोगों को श्रीकरतारपुर साहिब जाने के लिए प्रेरित करेगी तथा कई को लिखने के लिए भी।

भारत जोड़ो यात्रा में महात्मा गांधी के परपोते तुषार गांधी भी

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